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चलो जिदगीं को थोड़ा हम समझते है। 

रुकते है पलभर कही फिर हम चलते है। 

कुछ समय गुजर गये,अपनी परेशानियो मे। 

और हम उन उलझनो मे उलझ से गये है। 

जरा उन उलझनो को सुलझा लेते है। 

रूकते है पलभर कही फिर हम चलते है। 

कुछ रूठ गये हमसे, कुछ बिछड़ गये है। 

जिदगीं के दौड़ मे हम अकेले हम हो गये है। 

चलो एक बार उनको हम मना लेते है। 

अँधरे की हमे आदत सी हो गयी है। 

सुबह की तो चाहत ही मिट गयी हैं। 

माना की अँधेरा घना छा गया है। 

चलो प्यार के कुछ दीये हम जला लेते है। 

रुकते हे पलभर कही फिर हम चलते हैं। 

माना कि लंबी हे सपनो की फेहरिस 

बड़ी मुशिकल हे सबकी भरपाई। 

कई लोग हे जिदगीं के दौड़ मे। 

पर जरा जो गिरे हे उनहे उठा लेते हैं।

 रूकते हे पलभर कही फिर हम चलते हैं। 

कोहरा जो घना था वो छंँट रहा हैं। 

नया हे सबेरा ये नयी रोशनी है। 

हम भी हम एक नयी उमीद जगा लेते हैं। 

चलो जिदगीं को थोड़ा हम समझते हैं। 

रूकते हे कुछपल, फिर हम चलते हैं।




Author

Kumud Ranjan
Last Online: Sunday 19/08/18 | Published on: Monday 06/08/18

Kumud Ranjan is the author of this content.

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